राजसमंद- प्रकृति और संस्कृति का अनूठा मिश्रण

Related image

राजसमंद जयपुर से 350 किलोमीटर की दुरी पर दिल्ली-मुंबई राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। यहां पर वह सब कुछ है, जहा पर आपको किसी चीज की कमी ना रहे चाहे वह इतिहास हो, धर्म, या फिर प्रकृति और या फिर चाहे शिल्पकला |
नामकरण – 1676 में महाराणा राजसिंह ने एक समारोह करवाया और उस समारोह को करने के लिए गोमती नदी के जल धारा को रोकने के लिए एक झील का निर्माण किया गया | निर्माण के बाद उस झील का नाम राजसमंद रखा गया और इसके साथ ही पहाड़ पर एक मंदिर बनाया गया जिसका नाम राजमंदिर रखा गया इसी के साथ साथ नगर का नाम राजनगर रखा गया जो की बाद में राजसमंद कहलाने लगा इतिहास प्रेमी के लिए यह जगह किसी जन्नत से काम नहीं है क्यूंकि यहाँ आकर आपको राजस्थान के मेवाड़ की आन बान और शान के प्रतिक कुम्भलगढ़ दुर्ग, देवगढ़ का महल और सरदारगढ़ का किला देखने को मिलेंगे | इसके साथ ही आपको भारत के महान और पराक्रमी योद्धा श्री महाराणा प्रताप की वीरता और बलिदान की कहानी और हल्दी घाटी को देखने का मौका मिलेगा |

Image result for world's largest shiva statue in rajsamand
World’s largest shiv statue in India’s nathdwar

विश्व की सबसे ऊंची शिव प्रतिमा – राजसमंद के ही एक जिले नाथद्वार में विश्व की सबसे ऊँची भगवन शिव की प्रतिमा बन रही है जो कि अब लगभग पूरी होने वाली है | इस प्रतिमा को 20 किलोमीटर दूर से भी देखा जा सकता है और अगर सुरक्षा की बात करे तो यह भगवन शिव की प्रतिमा 250 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाले तूफान को भी झेलने में सक्षम है

Image result for राजसमंद झील

राजसमंद झील – महाराणा राजसिंह द्वारा सन् 1669 से 1676 बनवाई गई राजसमंद झील बेहद खूससूरत और मेवाड़ की विशालकाय झीलों मे से एक हैं | इसी झील के किनारे कांकरोली व राजनगर स्थित हैं। राजसमंद का प्रमुख आकर्षण है झील की पाल पर बनी ‘नौचौकी’। इस झील में संगमरमर से बने तीन मंडपों की छतों, स्तंभों तथा तोरणद्वारों पर की गई नक्काशी एवं मूर्तिकला लाजवाब है। तीनों मंडपों में प्रत्येक में नौ का कोण और प्रत्येक छतरी की ऊंचाई नौ फीट है। यह सब इस तरह से बनाया गया हैं की झील की सीढि़यों को हर तरफ से गिनने पर योग नौ ही होता है। इस पाल पर नौ चबूतरे (जिन्हें चौकी कहते हैं) बने होने के कारण इस का नाम नौचौकी हो गया। राजसिंह ने इस झील के लिए मेवाड़ के इतिहास का भी संग्रह करवाया और तैलंग भट्ट मधुसूदन के पुत्र रणछोड़ भट्ट ने उसके आधार पर ‘राजप्रशस्ति’ नामक महाकाव्य लिखा, जो पाषाण की बड़ी-बड़ी 25 शिलाओं पर खुदवाया गया।


आपको आश्चर्य चकित करदेगी पिछवाई पेटिंग – राजसमंद में नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर में प्रतिमा के पीछे सजाई जाने वाली पिछवाई पेंटिंग देखकर आप दांतों तले अंगुली दबा लेंगे। पिछवाई का मतलब है देव-स्वरूप के पृष्ठ भाग में टांगा जाने वाला चित्रित पर्दा। राजसमंद में वर्षभर कोई न कोई आयोजन होता ही रहता है, और इसी वजह से यहाँ पर पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है। कांकरोली एवं नाथद्वारा में प्रतिवर्ष अप्रैल माह में गणगौर का मेला लगता है। हल्दीघाटी व कुम्भलगढ़ में प्रताप जयंती पर मेला लगता है। नाथद्वारा और कांकरोली में जन्माष्टमी पर भव्य उत्सव का आयोजन किया जाता है। दीपावली के दूसरे दिन मनाया जाने वाला अन्नकूट उत्सव तो काफी प्रसिद्ध है। गढ़बोर चारभुजा में देवझूलनी एकादशी पर मेला लगता है। कुंवारिया ग्राम में तथा देवगढ़ में लगने वाले पशुमेले भी प्रसिद्ध है। कुम्भलगढ़ दुर्ग पर आयोजित होने वाला फेस्टिवल भी पर्यटकों में खूब लोकप्रिय है, जो यहां हर वर्ष दिसंबर माह में आयोजित किया जाता है। इस तीन दिवसीय उत्सव में जाने-माने शास्त्रीय नृत्य कलाकार भाग लेते है। इस वर्ष यह इसी माह के 1 से 3 तारीख को मनाया गया। यहा की चित्रकला भी अनूठी है। कांकरोली के श्री द्वारिकाधीश मंदिर में बनाए जाने वाले जल चित्र भी अपनी तरह के नायाब होते हैं।

टॉय ट्रैन – आपने शायद शिमला, दार्जिलिंग, ऊटी और माथेरान की टॉय ट्रेन की यात्रा की होगी, लेकिन राजसमंद में खामलीघाट से गोरमघाट का हसीन सफर भी यादगार बन सकता है। मावली से मारवाड़ जंक्शन मीटर गेज रेलवे लाइन पर राजसमंद जिले में देवगढ़ के पास स्थित है यह रेलमार्ग। बारिश के मौसम में तो इसका रोमांच चरम पर होता है। दरअसल, यह पहाड़ी मार्ग बहुत खूबसूरत है। बारिश के दिनों में हरी-भरी पहाडि़यों के बीच से गुजरते हुए, यू-आकार की पुलिया एवं टनल से निकलते हुए रेल जब धीमी गति से अपना सफर तय करती है तो ऐसा लगता है, जैसे जन्नत बस यहीं है। यानी गोरमघाट में प्राकृतिक जल प्रपात तथा एक मंदिर भी दर्शनीय है। टॉडगढ़ अभयारण्य क्षेत्र में होने के कारण यहां आपको जंगली पशु भी देखने को मिल जाएंगे।

Please follow and like us:

Related posts

Leave a Comment